जिंदगी को जिसके संग गुजरा है मैंने,
सुख दुख में हरदम ही पुकारा है मैंने,
ख्वाहिशों को अपने संवारा है मैंने,
उसी ने मुझे से छिपाए हैं कितने ही,
दिल के फसाने में जानू नहीं क्या?
बावजूद इसके जिगर का टुकड़ा,
अब तक उसे मैं मानू नहीं क्या?
मगर यह खाता ख़ुदा की कसम,
मुझे ही मुझसे करे है जुदा,
उनको खबर मिली ना भले हो,
आखिर हमीं तो बने गमशुदा ।
______राकेशकुमार शुक्ल नाशिक
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