पाऊं राम-सुधा का प्याला।
तर जाये है पीने वाला।
जीवन के इस हवन कुंड में,
राम राम कर जलती ज्वाला।
मेरा इक अदृश्य वो साथी।
जीवन दाता, जीवन हारा।
मन में मेरे ऐसे रहता
चमके जैसे भोर का तारा
रहे ख़ुशी में सब संसार।
हर इक दिल में पनपे प्यार।
बैर विरोध घृणा को छोड़,
हो उल्फत का सब व्यवहार।
- राकेश मल्होत्रा
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