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आत्महत्या

                
                                                         
                            दो वस्तु के घर्षण से
                                                                 
                            
पैदा होती है आग।
और तब कहीं जलता है
जीवन का चिराग।

न थी आंधी, न था तूफान
अपनी ही फूंक से
तूने दिया बुझा
स्व- जीवन का दीया।
नादान, यह क्या किया?

जग में अति हंसना मना है
और अति रोना भी मना है।
अति होना ही बुरा है
भेद हृदय की कहना भी मना है।

आह्लादित, प्रफुल्लित दिखने पर
जलने वाले जलेंगे ही
बिन आधार उपर जाने पर
गुरुत्वाकर्षण नीचे लायेगा ही ।

उँचाई पाना, नीचे आना
और फिर उँचाई को पाना
सफलता की असली कहानी है
पुरुषार्थ की असली रवानी है ।

अरे ओ छिछोरे, आखिर अपना
छिछोरापन दिखा ही गया
अरे ओ काई पो छे, वो जीवन का
पवित्र रिश्ता कहाँ चला गया ?

केदारनाथ की चोटियों पे चढना,
ही असली सफलता नहीं है
चोटियों से फिसल कर फिर से
चढना ही असली सफलता है ।

पाप वेदों ने है बताया
अपने आप से मरना मना है ।
कानून ने है बताया
मरना -मारना दोनों मना है
यह तुझे नहीं था पता क्या ?
नादान,यह तूने क्या किया?

स्व रचित
राकेश कुमार रूखैयार
(स्व सुशांत सिंह राजपूत के आत्मघाती कदम पर रचित रचना )

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4 वर्ष पहले

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