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वक़्त की बात

                
                                                         
                            मत किया कर फूलों से झगड़ा,
                                                                 
                            
वह कुम्हला जाते हैं,
ग़ुस्सा तो उनको भी आता होगा,
वह दिखा कहाँ पाते हैं!

तेरी पेशानी पे दो लकीरें क्या पड़ी,
ज़माना हिल उठा,
कभी नज़र भरकर उन्हें भी देखाकर,
जो सजदे में झुका.

वज़न शख़्स का नहीं
उस शाही तख़्त-ए-ख़ास का होता है,
आबनूसी तख़्तों को भी,
कई मर्तबा सैलाबों में उतराते देखा है.

पौधा तो अच्छा होगा ही,
अगर तूने बीज अच्छी क़िस्म का लगाया है,
गर खाद-पानी क़ायदे से दिया,
तो बागीचे में फल अमूमन अच्छा ही आया है.

दीवारों पर लिखी होती है वक़्त की भाषा,
ज़रा रुक कर पढ़ा कर,
ये ताक़त ये आडंबर ये दरबार और दरबारी,
निर्मोही हो जिया कर 
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3 घंटे पहले

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