तालीम के कई दफा
कई फायदे भी होते हैं,
मसलन, लोग किताबें पढ़ लेते हैं,
अक़्ल पर कुछ धार चढ़ा लेते हैं,
और, दीवार पर लिखी इबारत भी
कभी- कभार समझ लेते हैं.
होते हैं तमाम जो,
बेचारे जनम के अंधे होते हैं,
ऊपरी सतह को छूकर
नक़्शे को दिल में उतार लेते हैं,
कितना भी उंगली थामिये,
लीक को ही पकड़े चलते हैं.
दरअसल यह कोई ताज्जुब
की बात नहीं है,
इसमें दुनियाँ बनाने वाले की भी
कोई ख़ता नहीं है,
अंधे का गुरु ही अंधा है,
क्यूँ की, तालीम का होना
उसके भी भाग्य में बदा नहीं है.
पर परेशानी मक़सूस है,
रोशनी इन दोनों से ही बड़ी दूर है,
डरते भी हैं उनसे जो रौशनी में खड़े,
आदत से दोनों अपनी मजबूर हैं,
कमची से मास्टर कक्षा चला रहा है,
और अंधा इजलास उससे पिटकर,
बैठकर महज़ सिर हिला रहा है।
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