पंख तेरे अपने हैं,
तू इस क़दर बेचैन क्यूँ है!
आसमां बेइंतिहा है,
नापने की मशक़्क़त क्यूँ है!
अपनी अक़्ल-ओ-आंख
का इस्तेमाल किया कर ऐ मुसाफिर,
पता रहे के बहेलिया
इतने सुर मीठे लगाता क्यूँ है!
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