ढ़ो रहा हूँ बेवजह जो वज़न,
अहम मेरा अपना है,
ऊंचे आसमानों को छूकर आऊं,
यही सपना है,
मंज़िल कौन सी है मेरी यहाँ,
आजतक पता नहीं,
दूसरों की फतह वध से पहले शायद,
ख़ुद को जीतना है.
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