ये ज़िंदगी खींच-तान से कहाँ
बस में आती है,
ज़ोर लगा लें हम चाहे जितना,
रुख़ अड़ियल दिखाती है,
सब्र और हौसले का इम्तिहान
लेती है हर क़दम,
फुसला और पुचकार कर देखिये,
कैसे दौड़ी चली आती है.
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