मेरे अल्फाज
वह अबला नहीं
वह अबला नहीं—
बस सदियों से
अपने हिस्से का आकाश
किसी और के नाम लिखती रही है।
उसने चूल्हे की आँच में
अपने सपने पकाए,
आँगन की तुलसी में
अपनी इच्छाएँ छिपाईं,
और बच्चों की हँसी में
अपनी उम्र मुस्कुराती रही है।
पर अब—
वह अपने मौन की देहरी लाँघ रही है,
अपने प्रश्नों को
आवाज़ दे रही है,
अपने हिस्से की धूप
खुद चुन रही है।
वह केवल
किसी की बेटी, पत्नी या माँ नहीं,
वह स्वयं में
एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व है—
जिसकी अपनी उड़ान है,
अपनी पहचान है,
अपने निर्णयों का
अपना आसमान है।
उसे दया नहीं चाहिए,
न किसी कृपा का वरदान,
उसे चाहिए
बराबरी का अधिकार,
शिक्षा का उजियारा,
श्रम का सम्मान
और अपने जीवन पर
स्वयं का अधिकार।
वह खेतों में बीज भी बोती है,
प्रयोगशालाओं में भविष्य भी गढ़ती है,
सीमा पर साहस बनकर खड़ी है,
अंतरिक्ष में नए क्षितिज पढ़ती है;
वह कलम उठाती है
तो इतिहास बदलता है,
वह कदम बढ़ाती है
तो रास्ता निकलता है।
उसके पंखों को
आसमान मत नापो—
आसमान छोटा पड़ जाएगा;
उसकी आँखों में पलते स्वप्नों को
परंपराओं की दीवारों में मत बाँधो—
वह दीवारों से भी
रास्ते निकाल लेगी।
जिस दिन
हर बेटी को जन्म लेने पर
उत्सव मिलेगा,
हर स्त्री को निर्णय लेने का
अधिकार मिलेगा,
हर श्रम को सम्मान
और हर आवाज़ को
सुनने वाला समाज मिलेगा—
उस दिन
सशक्त होगी केवल महिला नहीं,
सशक्त होगा परिवार,
सशक्त होगा समाज,
सशक्त होगा राष्ट्र।
क्योंकि—
जब स्त्री अपने पैरों पर खड़ी होती है,
तो केवल एक जीवन नहीं सँवरता;
एक पीढ़ी उठती है,
एक समाज बदलता है,
और इतिहास
नई दिशा में मुड़ता है।
वह अब किसी की छाया नहीं,
वह स्वयं प्रकाश है—
वह घर की नींव भी है,
और भविष्य का आकाश भी।
उसे रोकना मत—
उसे उड़ने दो।
क्योंकि
जिस समाज ने अपनी स्त्री के पंख पहचान लिए,
उस समाज ने
अपने भविष्य की उड़ान पहचान ली।
-राजेश्वरी पंत जोशी
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