न उसने कभी मुझे चाँद कहा, न मैंने उसे प्यार कहा,
हमने इस छत्तीस के आँकड़े को ही घर-बार कहा।
एक ही छत के नीचे दो मौसम साथ चलते रहे,
वो जब अंगार बनी, तो मैंने खुद को बरसात कहा।
न कभी इत्र न गुलाब दिया, न वादा-ए-यार किया,
थाली में रोटी ज़्यादा रख के, उसी को इज़हार कहा।
रसोई में बर्तन खनके तो लगा जंग का ऐलान हुआ,
चूड़ी की खनक में धीरे से उसने - खाना तैयार कहा।
न कभी झुक कर मनाया उसने, न हमने माफ़ी माँगी,
बस ख़ामोशी में ही हमने, चलो भूलते हैं यार कहा।
एक उम्र जब गुज़री तब यह मुझे एहसास हुआ,
अब तक तोहफ़े की फ़र्ज़ी अर्ज़ी को ही प्यार कहा।
ये छत्तीस का आँकड़ा भी क्या रियाज़ है मोहब्बत का
लड़ते रहे ताउम्र, खटास ही जीवन का किरदार रहा।
अनबन रही ताउम्र, फिर भी देखो अजब है ये किस्सा,
भले ही बिखरे रहे, और दुनिया इसे असीम प्यार कहा।
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