ज़िंदगी जीने का मुझे कोई तो हुनर दे दे,
अँधेरे में अँधेरा ही सही, सुबह तो रोशनी दे दे।
भटकता फिर रहा हूँ ख़्वाहिशों के शहर में,
मंज़िल न सही, सफ़र में कोई तो हमसफ़र दे दे।
थक चुकी हैं आँखें ख़्वाब संजोते-संजोते,
इन वीरान आँखों को तू अब तो कोई सहर दे दे।
सूख गए हैं सारे पत्ते उम्मीद की शाख़ों के,
इस उदास मौसम में किसी बहार का असर दे दे।
बहुत सह ली तन्हाई की धूप हमने उम्र भर,
अब छाँव में जो गुज़रे, ऐसा कोई शजर दे दे।
बिखर गए हैं रास्ते भी मेरी तन्हाइयों की तरह,
भटक न जाऊँ कहीं, मुझे कोई रहगुज़र दे दे।
जो बात दिल में दबी है, उसे कहने का हौसला दे,
लबों को ख़ामोशी नहीं, दिल को कुछ असर दे दे।
जो खो गया है मुझसे, उसे लौटाना ज़रूरी नहीं,
बस ज़िंदगी को जीने का तिनका भर सब्र दे दे।
बहुत दूर निकल आया हूँ ख़ुद अपनी तलाश में,
मुझे ख़ुद से मिला दे, ऐसा कोई सफ़र दे दे।
अब इस दर्द भरे दिल को नहीं सह सकता,
तू मरहम न दे सही, ज़हर का ही असर दे दे।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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