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अश्कों से उसके सपने धोए, हिज्र की रात से किया प्यार

                
                                                         
                            अश्कों से उसके सपने धोए, हिज्र की रात से किया प्यार,
                                                                 
                            
बीत गए बरसों जिसके बिन, फिर भी उससे उम्मीदें हज़ार।

प्यार की उलझी गाँठें खुलीं, पतंग को मिल गई जैसे डोर,
राहें तकते किवाड़ भी थक गए, चिराग़ करें हवा से गुहार।

सूनी गलियों में उसकी आहट, दिल ढूँढ़े उसे हर घर दुआर,
चाँद भी उसकी राहें निहारे, तारों में भी उसका इंतज़ार।

सूखे पत्तों की सरसराहट, कण-कण करे उसकी ही पुकार,
दूर कहीं जब दीपक झिलमिलाए, लगता लौट आया प्यार।

मौसम बदले, साल गुज़र गए, बदला नहीं दिल का संसार,
जिस राह से वह लौट के आए, उस राह का करूँ श्रृंगार।

रात ढले जब चाँद भी छिप गया, जागें मन में कई विचार,
नींद भला अब कैसे आए, जब दिल में है उसका इंतज़ार।

'अगस्त्य' बैठा है आस लगाए, आँखों में लेकर गहरा प्यार,
वो लौट आए तो जीवन महके, लौट आए तो हो जाए बहार।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
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एक घंटा पहले

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