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विचलित हो तुम या निर्बला

                
                                                         
                            ये दलित कब तक दलित रहेंगे
                                                                 
                            
और स्त्री कब तक अबला

कब तक तुम देखते रहोगे कि
कोई तेरा नेतृत्व करेगा और
तुम हो जाओगे सर्वमान्य
अपना नेता खुद बनो भाई
अवधारणाओं को तोड़कर,
लक्ष्य को भेदकर और
झूठे सम्मान को त्यागकर

विचलित हो तुम या निर्बला
या कोई शिकार हो तुम
जिसका आखेट हो रहा
तुम्हें कहां लडऩा है
ये नहीं तुम्हें पता?
बज्र देह, लावण्य नहीं
घोष बन ,चीत्कार नहीं
पुरुष सत्य है या प्रश्न चिन्ह?
तुम्हें विवेचना करना ही होगा।

 
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34 मिनट पहले

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