नेपाल में आई बाढ़,
अपने साथ सिर्फ़ पानी नहीं लाई थी,
वो मलबा भी लाई थी,
टूटेewq घरों की चीखें लाई थी,
बिछड़े अपनों की यादें लाई थी,
और अपने साथ
इंसान की वर्षों पुरानी गलतियों का हिसाब लाई थी।
एक सुबह थी…
आसमान कुछ ख़ास नहीं था,
बारिश भी नहीं हुई थी,
नदियाँ भी शांत थीं,
लोग अपने-अपने घरों में थे,
किसी को क्या पता था—
कि अगले कु
Klछ पलों में
उनकी दुनिया बदलने वाली है।uuutw2re
अचानक पहाड़ टूटा,
पानी गरजा,
मलबा दौड़ा,
और बाढ़ ने
जो सामने आया, बहा दिया।m
लोग पूछने लगे—
“आख़िर ये बाढ़ आई क्यों?”
किसी ने कहा—
हिमनद टूटा होगा।
हाँ…
हिमनद टूटा था,
पर क्या हिमनद ही दोषी था?
ज़रा ठहरकर पूछो खुद से—
क्या हिमनद यूँ ही टूट जाता है?
क्या तापमान बढ़े बिना
बर्फ़ यूँ ही पिघल जाती है?
क्या जंगल कटे बिना
पहाड़ यूँ ही कमज़ोर हो जाते हैं?
नहीं…
इसके पीछे
सिर्फ़ एक टूटा हुआ हिमनद नहीं था,
इसके पीछे थे
हमारे वर्षों के पाप।
हमारा अंधाधुंध प्रदूषण,
हमारी अंधाधुंध कटाई,
हमारी अंधी विकास की दौड़,
हमारा बढ़ता तापमान,
और प्रकृति के प्रति
हमारी लगातार बढ़ती बेरुख़ी।
हमने पहाड़ों को काटा,
जंगलों को उजाड़ा,
नदियों के रास्ते रोके,
हवा को ज़हर दिया,
और फिर उम्मीद की—
कि प्रकृति हमें माफ़ कर देगी।
लेकिन…
प्रकृति सब सहती है,
पर सब भूलती नहीं।
वो चुप रहती है,
लेकिन उसकी चुप्पी को
कमज़ोरी मत समझना।
कभी जंगल के पत्तों में
उसकी सिसकी सुनाई देती है,
कभी सूखी नदी के किनारे
उसकी तड़प दिखाई देती है,
और कभी…
कभी हिमालय रोता है।
हाँ,
हिमालय रो रहा था।
उसकी बर्फ़ पिघल रही थी,
उसकी चोटियाँ तप रही थीं,
उसकी छाती पर
हमारे बनाए हुए घाव थे।
वो शायद हमसे पूछ रहा था—
“मैंने तुम्हें नदियाँ दीं,
तुमने मुझे ज़ख़्म क्यों दिए?
मैंने तुम्हें पानी दिया,
तुमने मुझे प्रदूषण क्यों दिया?
मैंने तुम्हें जीवन दिया,
तुमने मेरे जंगल क्यों काट दिए?
मैं सदियों से खड़ा था
तुम्हारी रक्षा करने के लिए,
फिर तुमने ही
मेरी नींव क्यों हिला दी?”
और शायद…
उस दिन हिमालय की आँख से
एक आँसू गिरा था।
लेकिन वो आँसू
आँसू बनकर नहीं गिरा—
वो सैलाब बन गया।
वो घाटियों में दौड़ा,
नदियों में गरजा,
मलबे को साथ लेकर आया,
और अपने रास्ते में
हमारी बनाई हर दीवार को
तोड़ता चला गया।
लोग कहने लगे—
“बाढ़ ने तबाही मचा दी।”
नहीं…
शायद बाढ़ तबाही मचाने नहीं आई थी,
वो हमें आईना दिखाने आई थी।
उस आईने में
दोषी हिमालय नहीं था,
दोषी नदी नहीं थी,
दोषी बारिश नहीं थी।
दोषी मनुष्य था।
दोषी मनुज था।
दोषी हम थे।
हमने प्रकृति को
बार-बार छेड़ा,
उसकी सीमाओं को
बार-बार लांघा,
और हर बार सोचा—
“कुछ नहीं होगा।”
लेकिन प्रकृति जब जवाब देती है,
तो जवाब शब्दों में नहीं देती।
वो तूफ़ान बनकर आती है,
भूकंप बनकर आती है,
सूखा बनकर आती है,
बाढ़ बनकर आती है।
और तब…
महल भी मिट्टी हो जाते हैं,
सड़कें नदियाँ बन जाती हैं,
पुल तिनकों की तरह बह जाते हैं,
और इंसान
अपनी ही बनाई दुनिया के सामने
बेबस खड़ा रह जाता है।
याद रखो—
प्रकृति को मत छेड़ो,
इतना मत छेड़ो
कि उसकी सहनशीलता टूट जाए।
क्योंकि
जिस प्रकृति की गोद में
हमने जन्म लिया है,
अगर वही प्रकृति
हमसे रूठ गई—
तो हमारी तरक्की,
हमारी इमारतें,
हमारी सड़कें,
हमारी मशीनें,
हमारी सारी ताक़त…
कुछ भी हमें नहीं बचा पाएगा।
हिमनद तो
शायद एक निमित्त मात्र था,
एक आख़िरी कड़ी था
उस कहानी की
जो हमने वर्षों पहले लिखनी शुरू कर दी थी।
कहानी थी—
बढ़ते तापमान की,
कटते जंगलों की,
पिघलती बर्फ़ की,
घायल पहाड़ों की,
और मरती हुई प्रकृति की।
आज नेपाल में
जो बहा है,
वो सिर्फ़ घर नहीं हैं।
वो हमारी लापरवाही का परिणाम है।
आज हिमालय रोया है…
कल कौन रोएगा?
आज एक नदी उफनी है…
कल कहीं हमारा शहर न डूब जाए।
इसलिए अभी भी समय है—
पेड़ बचा लो,
पहाड़ बचा लो,
नदियाँ बचा लो,
हिमालय बचा लो।
क्योंकि…
हिमालय रहेगा,
तो नदियाँ रहेंगी।
नदियाँ रहेंगी,
तो जीवन रहेगा।
और जीवन रहेगा,
तभी तो हम रहेंगे।
और अगर फिर भी
हमने प्रकृति को नहीं समझा…
तो याद रखना—
अगली बार हिमालय का आँसू
सिर्फ़ एक बाढ़ नहीं होगा…
वो हमारे अस्तित्व से
पूछा गया आख़िरी सवाल होगा।
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