मन बचा रहे तो तन भी अपना है
तन की चिंता करना बेकार है,
यदि मन ही बिगड़ गया,
तो तन को सँवारकर भी क्या करोगे?
जब मन ही नहीं बचा तन में,
तो उस तन का क्या करोगे,
जिसमें धड़कन तो हो,
पर जीने की चाह न हो?
बिना मन के भटकता हुआ भूत भी देख लिया,
अब भविष्य की चिंता करना भी व्यर्थ है।
कल क्या होगा, किसे पता—
जब आज ही मन से खाली हो चुके हैं हम।
इसलिए तन से पहले मन को बचाना,
क्योंकि मन रहे तो जीवन है,
मन चला जाए तो
साँसें भी बस एक आदत रह जाती हैं।
— रजनी
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