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हद से ज़्यादा

                
                                                         
                            हद से ज़्यादा
                                                                 
                            

मैंने एक बार पौधे को
ज़रूरत से ज़्यादा पानी दे दिया था,
सोचा था,
जितना अधिक पानी मिलेगा,
उतना ही वो हरा-भरा रहेगा।

मगर कुछ ही दिनों में
वो पौधा सूख गया,
और मुझे ज़िंदगी का
एक बड़ा सबक दे गया।

हर अच्छी नीयत
अच्छा परिणाम नहीं देती,
अगर उसकी मात्रा
हद से आगे बढ़ जाए।

पानी ज़रूरी था,
मगर ज़रूरत से ज़्यादा पानी
उसके लिए ज़हर बन गया।

तब समझ आया—
चाहे प्रेम हो,
परवाह हो,
मदद हो या अपनापन,
हर चीज़ की एक सीमा होती है।

कभी-कभी हम किसी को
बहुत कुछ देने की चाह में
उसे वही दे बैठते हैं
जिसकी उसे ज़रूरत ही नहीं थी।

नीयत हमारी अच्छी हो सकती है,
मगर हद का ख़याल रखना भी
उतना ही ज़रूरी है।

क्योंकि
कुछ रिश्ते कमी से नहीं,
हद से ज़्यादा मिलने से भी
सूख जाते हैं।
— रजनी
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एक दिन पहले

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