दस साल मैंने अपनी शिक्षा में लगा दिए,
ख्वाबों को किताबों के पन्नों में सजा दिए।
समय दोनों को बराबर दिया, किसी को कम,
न किसी को ज्यादा दिया,
दस साल ही मैंने अपनी शादी को बचाने में गुज़ार दिए,
टूटते रिश्तों को हर दिन फिर से जोड़ते-संवार दिए।
हर फ़र्ज़ निभाया समय पर, जो मिला उसे शिद्दत से किया,
कर्तव्य से कभी विमुख न हुई, हर काम को इबादत सा जिया।
कभी खुद को समझाया, कभी हालातों से लड़ा,
कभी चुप रहकर भी अंदर ही अंदर बहुत कुछ सहा।
अब न कोई शिकवा है, न कोई ग़म बाकी है,
ज़िंदगी जैसी भी है, अब बस वही काफी है।
ना डर है कल का, ना पछतावा किसी बात का,
जो भी होगा आगे, वही होगा मेरे साथ का।
अब दिल हल्का है, और सोच में सुकून है,
जैसे थक कर भी कोई मुसाफ़िर पहुंचा हो अपने जुनून के मुकाम पर।
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