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दर्द से निकली संवेदना

                
                                                         
                            दर्द से निकली संवेदना
                                                                 
                            

जो खुद गिरकर संभले हैं,
वो किसी को धक्का नहीं देते,
जिन्होंने दर्द को करीब से देखा है,
वो किसी को दर्द देना नहीं सीखते।

जिन्होंने टूटना सहा है,
वो किसी को तोड़ना नहीं जानते,
क्योंकि जो खुद अँधेरे से निकलकर आया हो,
वो किसी और को अँधेरे में धकेल नहीं सकता।

जिसने सच में दुःख जिया है,
वो दूसरों के आँसू पहचान लेता है,
वो किसी के घाव पर नमक नहीं छिड़कता,
बल्कि चुपचाप मरहम बन जाता है।

दर्द इंसान को कठोर नहीं बनाता,
अगर दिल में इंसानियत बची हो,
तो वही दर्द उसे और संवेदनशील बनाता है—
दूसरों के दर्द को समझने के लिए,
दूसरों को संभालने के लिए।

शायद इसीलिए
कुछ लोग बहुत कुछ सहकर भी
किसी को कुछ नहीं कहते,
क्योंकि वे जानते हैं—
दर्द देना आसान है,
दर्द समझना इंसान होने की निशानी है।
— रजनी
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19 घंटे पहले

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