क़ैद में तो हो ही कहते हो आजाद हो
क़ैद उस आखिरी जीत की जिसे पाने में नाकाम हो
क़ैद उस आखिरी ख़ुशी की जिसे पाने को बेताब हो
क़ैद उस जज़्बात की जिसे तुमने उसूल माना है
क़ैद उस भरम की जिसे तुमने गुरूर माना है
क़ैद उस फ़र्ज़ की जो तुम्हें भाया है
क़ैद उस तर्क की जिसे तुमने सच पाया है
क़ैद उस याद की जो तुमसे कभी न जुदा हो
क़ैद उस लकीर की जो जमाने का कायदा हो
क़ैद उस इश्क की जिसमें शायद वफ़ा हो
क़ैद उस रंज की जिसमें हमराज की जफ़ा हो
क़ैद में हो
उस बीते लम्हे की जिसे दुआ में मांगते हो
उस मक़ाम की जिसे ख़ुदा मानते हो
उस हसरत की जिसे हर सुबह चाहते हो
उस जरूरत की जिसे जिंदगी की वज़ह मानते हो
चाहे नौकरी में खपना हो या हर सीख याद रखना हो
चाहे दौड़कर चलना हो गया गिर कर संभालना हो
यादों में क़ैद रहना हो या भूलकर सब आगे बढ़ना हो
क़ैद में तो हो ही
चाहे लड़कर जीतकर मारना हो या हार कर जीना हो।।
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