ख़याली-पुलाव
देखता हूं अगर...
मेरी, हक़ीक़त पे,
क्यों नहीं है नज़र?
चीज़ें, अपने मुताबिक़, मांगते मांगते...
ध्यान भटक गया हो :(
जब सब अनुकूल होता है...
तब भी तो, मैं बहकावों के पास जाता हूं
पढ़ाई करने के अलावा...
मुझे और क्या आता है?
हासिल करने तक
कुछ ना बोलूं...
लगता है, यही ख़ुदा चाहता है
अब पुराने दिन तो
बीत चुके...
क्यों तैयारी से...
हम खीझ रहे?
एक-दो बार
और अच्छा प्रयास कर लें!
इस बार ना... साहस कम होए...
इस बार ना... प्यास विघ्न बने...
प्रभु, ऐसी कृपा करें
जीत, बड़े अंतर से मिले... जी, बस मेहनत करने में लगे...
-राहुल
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