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पत्ते की जिन्दगी

                
                                                         
                            एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी
                                                                 
                            
सूख जब मैं गया फिर हुई ये ठगी
ना ये उपवन हमारा न दुनिया सगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

शाख ने जब गिरा मैं निष्प्राण था
ले गयी फिर हवा मुझको संज्ञान था
चीखता मैं रहा ना ये दुनिया जगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

अपने तन मन को फिर से भिगो ना सका
थोड़ा सुस्ताया लेकिन मैं सो ना सका
मैं जिधर भी गया मुझको ठोकर लगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

रोशनी फिर दिखी मैं उधर ही चला
मुझको मंजिल मिली आग में था जला
बस वहीं थम गई मेरी आवारगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

- राघव शुक्ल

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8 वर्ष पहले

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