तुमने देखा नहीं हमें, देखने दिया नहीं,
फिर कैसे नयनों से तुमको दिल में उतारेंगे?
जो मिल गए उस जनम में, तो फिर कैसे पहचानेंगे?
कैसे चल पाएंगे रहकर अलग, आसां नहीं यह प्रेम की वीथी,
क्षणभर को तो रखते इस हृदय में, भले बनाकर अतिथि।
कोई लगाकर आश रहे बैठे, कब ये मौन तुम्हारा टूटे,
दिल में दबे जज्बात को, इस मन की बात को—
तुमने कहा नहीं, हमें कहने दिया नहीं,
फिर कैसे एक-दूसरे के दिल का हाल जानेंगे?
जो मिल गए...
नियति के इस खेल को, हम भला क्या पहचानें,
अनजाने में ही मिल गए, ज्यों दो अनजाने।
तुमने जाना नहीं हमें, जानने दिया नहीं,
फिर कैसे रहकर अनजान, यह उम्र गुजारेंगे?
जो मिल गए...
मैं तुम्हारा, तुम मेरी, तुम मेरी, मैं तुम्हारा,
उस पार तक रहे साथ हमारा।
यूं कसमें खाकर, किसी मंदिर में जाकर—
तुमने मांगा नहीं, हमें मांगने दिया नहीं,
फिर कैसे बिन मांगे इस मांग को देव स्वीकारेंगे?
जो मिल गए...
न वचन कोई, न स्मृति का क्षण,
फिर कैसे रख सकेंगे इस जीवन का स्मरण?
जीवन के इस हिस्से को, प्रेम के अधूरे किस्से को—
तुमने सुनाया नहीं किसी को, हमें सुनाने दिया नहीं,
फिर मैं वही हूँ, तुम वही हो, किस साक्ष्य से ये मानेंगे?
जो मिल गए उस जनम में, तो फिर कैसे पहचानेंगे?
- राधा चौहान
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