ये कैसी घड़ी है आई,
कल तक अपनी थी ज़मीन जो ,आज हुई पराई।
हाय! परिस्थितियां ये कैसी,
अपने ही मुल्क में हम तो परदेसी,
हाथों से बनाया जो घर अपना, छूट गया
पल भर में ही देश हमारा ,कांच की तरह टूट गया।
कल तक संग खेले थे हम जिस आंगन में,
उसमें आज दरारें पड़ गई हैं,
सोना उगलने वाली धरती पर लाशें बिछ गई हैं।
कि जश्न का दिन आया जब ,
लेकर नया सवेरा साथ,
फिर क्यों छा गई यह काली अंधेरी रात?
हम तो हमसाया थे कभी, अब नजरों में खटकते हैं,
मानो हैवान हो गए, लहू के प्यासे दर-दर भटकते हैं।ऐसा भी तो पत्थर कैसे दिल बनाया,
बच्चों पर भी शमशीर उठाते, जिसे रहम न आया।
हंसना था जब इन होठों को,
आंखों से आंसू बहाते हैं,
आज तो खुलकर जीने का दिन आया था,
हम जान बचाते छिपते हैं।
चाह की जिसकी ,कितने अरमानों से वो आज़ादी मिली थी,
न जानते थे ऐसी सहर होगी, इससे तो शब ही भली थी।
आज रात आखिरी है इस घर में,
कल का दिन जाने कहां ले जाएगा,
हम तो निकल जाएंगे नए आशियाने को,
ये अकेला रह जाएगा।
जाने फिर लौटेंगे कि नहीं, जाने वाले ,
नए शहर में कैसी गुजरेंगी रातें, कैसे होंगे दिन आने वाले।
ये सोच-सोच आंखें, हर दृश्य को चलें-चलें भरतीं,
कल बेगानी होगी ये धरती।
कल तक तो रिश्ते-नाते थे,
एक-दूजे के घर आते-जाते थे,
कभी-कभी तो खाना भी, एक थाल में खाते थे।
क्या हुआ अब, किस बात पर हुई है लड़ाई?
हम तो ऐसे रहते थे, जैसे एक मां के जाए दो भाई।
कहां से आया ये शब्द 'गैर-मज़हबी',
क्या इसके मायने?
जो उसके लहू का अलग हो रंग, तो जाने
क्या पैमाने हैं इसके,उन पैमानों पर रख के तौल,
मैं भी इंसा, तू भी इंसा, बोल 'गैर-मज़हबी' कौन?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X