अगर कहीं से कुछ मिल जाए तो यह मेरा है मुक्कदर
ऐसी वैसी बात नहीं, मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं, मैं राहों का हूं पत्थर
मत पूछो जिंदगी को कैसे कैसे जिया है
एक बार नहीं, दो बार नहीं ,
कई बार हमने जहर पिया है
चाहे लाख गम से घिरे रहे
पर सबके सामने आते रहे हंसकर
ऐसी वैसी बात नहीं , मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं, मै राहों का हूं पत्थर
डूबते को क्या चाहिए तिनके का सहारा
ऐ मौला सब तेरा है, कुछ तो नहीं है मेरा
हां , हमको मंजूर है, अगर तुझसे मिले हमको भँवर
ऐसी वैसी बात नहीं, मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं, मै राहों का हूं पत्थर
कोई किसी को क्या देगा, किसी के पास क्या है
जिसका जग में कोई नहीं उसका तो खुदा है
मैं जनता हूं किसी को मालूम हो ना हो,
उसको तो सब है खबर
ऐसी वैसी बात नहीं मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं, मैं राहों का हूं पत्थर
है इतना आंखों में आंसू,जितना सागर में पानी है
जीना इसी को कहते है,सब की यही कहानी है
तुझको मिलेगी तेरी मंजिल,लंबा थोड़ा है सफर
ऐसी वैसी बात नहीं, मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं मै राहों का हूं पत्थर
काहे कोई तेरी सुनेगा, क्या तेरी भूख प्यास
तू रुक मत तू चलता जा
अगर तुझमे बाकी कोई आस है
सिख लिया है हमने खुद को आग में जलाना
हर हद से हमको जाना है गुजर
ऐसी वैसी बात नहीं, मेरी कुछ औकात नहीं
मैं राहों का धूल हूं , मै राहों का हूं पत्थर
कही से कुछ मिल जाए तो, यह मेरा है मुक्कदर
-रविन्द्र अमन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X