वो हमसे जुड़ी हर निशानियां मिटा रहें हैं
कुछ बेच रहें कुछ जला रहें कुछ लुटा रहें हैं
अब उस न समझ को कौन समझाए
जमीं वही है बस मालिकाना हक़ बदल रहें हैं...
-पुष्पेंद्र
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