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झूठे वादे और इल्ज़ाम

                
                                                         
                            जो कहती थी 'तुम्हारे बिन मैं जी नहीं पाऊंगी',
                                                                 
                            
तुम ज़िद हो मेरी, मैं तुम ही से शादी रचाऊंगी।
खाती थी जो कसमें कभी खुद की, कभी माँ-बाप की,
वो मुकर गई, जिसे फिक्र थी बस अपने आप की।
सहेली को साथ लेकर वो हर बार मिलने आती थी,
महंगे से रेस्टोरेंट में वो खुशियाँ मनाती थी।
मैंने तोहफे दिए, पलकों पे बिठाया, हर ख्वाब सजाया,
पर मेरी इस मोहब्बत का उसने ये सिला चुकाया।
पीठ पीछे मेरे वो न जाने कितनों से बात करती थी,
थी वाकिफ ये दुनिया, मगर मेरी रूह तो उसपे मरती थी।
मैंने टोका नहीं कभी, बस अंधा ऐतबार किया,
उसने खेल खेला, और मैंने बेइंतहा प्यार किया।
मगर कल जब वो छोड़ गई, तो मैं टूटकर बिखर गया,
हँसता खेलता वो लड़का, जीते जी ही मर गया।
हद तो तब हुई, जब उसने मुझ पर ही सारा दोष मढ़ दिया,
मेरी पाक मोहब्बत के आगे, झूठी बातों का पर्दा कर दिया।
कहती है कि मैंने उसकी तस्वीर को बदनाम किया है,
उसके होने वाले शौहर को गलत पैगाम दिया है।
जिसने कभी ख्वाब में भी उसे धोखा नहीं दिया,
आज उसे ही कसूरवार कह कर, वो दामन छुड़ा गई,
खाकर कसमें हज़ार, वो लड़की बदल गई।
— प्रेम शंकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
46 मिनट पहले

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