आकर करीब तेरे किया महसूस ये भी इज्जत तर्क ए वफा की भी ना रही और रहा बेखबर तू जैसे कुछ हुआ नहीं
बर्बाद कर हमें खाक में मिलाने वाले हाल मेरा सोचा कभी नहीं मिट गई मेरे हाथों की लकीरें दिखा तुम्हें कुछ नहीं
गर तू ही खफा मुझसे तो अभी बिछड़ जा बुरा वक्त जब कभी आया हुआ इंसानियत कत्ल कहना तुमसे कुछ नहीं
मैं इस वास्ते चुप बैठा कि कुछ और तमाशा ना बन और तू भी अब लगा सोचने जैसे कोई गिला मुझसे कुछ नहीं
जगा के अरमां सारे इक खत मैंने तुमको दिया कल खातिर या लिहाज से जवाब में लिखा तुमने भी तो कुछ नहीं
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