हुई कोशिशें जब भी नाकाम तो फैसला नसीब का मंजूर करना पड़ा है कभी हंस कर कभी रो कर दर्द सहना पड़ा
तू हो ना सकेगा मेरा ये कभी ये कबूल करना पड़ा हमें जान के खेल नसीब का हमें अब तुमसे ही अर्ज करना पड़ा
या खुदा तुमने जो सजा दी है हमें सहना पड़ा फैसला खिलाफ मेरे तेरा सख्त ऐसा क्यूं हमें दर्द सारा सहना पड़ा
अब तुम सोचो तोड़ कर दिल अपना मझधार में डूबना पड़ा हमें क्यूं जब मैं ही ना संभल पाया तो दर्द कहना पड़ा
अब मयस्सर नही मेरे नसीब में वो गुजरा जमाना या खुदा तू ही जब पिघला नहीं तो करूं भी क्या दर्द सहना पड़ा
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