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वो पीपल का पेड़

                
                                                         
                            वो पीपल का पेड़
                                                                 
                            

कहाँ गया वो पीपल का पेड़,
जो दूर से ही दिख जाता था,
उसी पेड़ के होने से कभी,
हमको पहचाना जाता था।

वही पीपल का पेड़ था जिसकी छाँव में बच्चे खेला करते थे,
बैठे रहते थे डालों पे जब बकरियाँ चराया करते थे।

लगता था चौपाल यही पे,
पंच यहीं विराजा करते थे,
होते थे यहीं सभी फैसले,
पंच-दंड भी सुनाया करते थे।

रात में भूतों का भी बसेरा
इसी पेड़ पर बताया जाता था,
कहाँ गया वो पीपल का पेड़,
जो दूर से ही दिख जाता था।

पूजा, धागा, कंकु, आरती,
सब इसकी उतारा करते थे,
कोई मन्नत, कोई दान-दक्षिणा देकर,
इसको पवित्र बनाया करते थे।

नाऊ, हलवाई और हाट भी,
यहीं कहीं तो लगता था,
बीच दुपहरी इसी छाँव में,
सबका मन यहां रमता था।

चाय पे चर्चा, मज़े की बातें,
सबकी यहीं पे होती थीं,
यहीं बैठे-बैठे कइयों संग,
गप्पें सारी जग की होती थीं।

यहीं खुलता था पोल सभी का,
यहीं गहन चिंतन भी होता था,
किसी के सुख-दुःख की बातें थीं,
किसी का मन भी हल्का होता था।

कभी चबूतरा, कभी मंदिर, कभी चौराहे का बस-स्टैंड बन जाता था,
और कभी-कभी दूर खड़ा यही भुतहा पीपल कहलाता था।

गाँव के सारे मेलों और झगड़ों का,
यही तो दर्शक पुराना था,
कितनी पीढ़ियाँ, कितने मौसम,
सब देख चुका वो पीपल का पेड़ पुराना था।

आज न जाने कहाँ गया वो पीपल का पेड़, जो दूर से ही दिख जाता था,
उसी पेड़ के होने से कभी हमको पहचाना जाता था।

 
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7 घंटे पहले

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