भ्रमित पथ से ,केवल कुमुदिनी की तलाशों में,
उन्हें रास नहीं आता प्रजा पालन प्रयासों में।
जिम्मेदारी का याद दिलाना बागी माना जाएगा ,
भूले बिसरे कामों को फिर कौन याद दिलाएगा ?
तुम्हारे भीड़ का हिस्सा हम बन नही पाए,
केवल प्रश्न पूंछे हैं खुशामद कर नहीं पाए।
दिखावे की दोस्ती निभाना नहीं आता ,
झूठी वाहवाही तो हमे करना नहीं आता ।
अंदेशा जब भी होता है आगाह करता हूं ,
आलोचक हो सकता हूं दरबारी बन नहीं सकता
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