अमूमन होती है चाह
हर किसी के अंदर
सुविधा पाने की
संपत्ति की, सुख की
और न जाने किस-किस
चीज़ की
हकीकत है यह
कि सभी लोग
चाहते हैं पाना
कुछ-न-कुछ जीवन में
सच तो यह है
कि भटकाती है चाह
इंसान को
जिससे होती है उत्पन्न चाह
और अधिक पाने की उसमें
असल में
होती है पैदा चाह
मन ही में तो
यह मन ही है जो
पैदा करता जाता है
एक के बाद दूसरी चाह
और एक चाह पूरी होने पर
जाग उठती है
दूसरी चाह की इच्छा
मन में
साथ ही उस चाह को
पूरी करने की चिंता भी
लेती है जन्म
असल में,
चाह की जुड़वा बहन है चिंता
यही चिंता है
इंसान की सबसे बड़ी शत्रु
जो जलाती रहती है उसे
हर पल
जबकि चिता जलाती है
केवल एक ही बार
नचा रही है चाह आपको
जिससे हो रही है पैदा
चिंता
आपके अंदर
इसलिए साधिए
मन को अपने
जिससे हो न पैदा उसमें
हर बार चाह
कुछ-न-कुछ पाने की
इससे मिटेगी चिंता भी
आपकी
चाह पूरी होने की।
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