सफ़र का सौदागर हूँ मैं,
इस कदर राहों में गुम रहा,
ज़माने को तो देखा बहुत,
मगर तुमसे ही दूर रहा।
तुम्हारी ख़ामोशी और समर्पण,
मेरे सफ़र की सबसे बड़ी मिसाल रहे।
अगर तुम्हारा साथ न मिलता,
तो शायद मैं हर मोड़ पर मजबूर रहे।
किसी दिन फ़ुर्सत से बैठकर,
ज़िंदगी का हिसाब लगाऊँगा।
क्या खोया, क्या पाया मैंने,
और क्यों तुमसे सबसे ज़्यादा दूर चला आया।
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