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अपने पुराने आकाश को खोजता हूँ।

                
                                                         
                            ये शहर
                                                                 
                            
बहुत कुछ कहता है,
मगर सुनता बहुत कम है।

यहाँ हर चेहरा
एक बंद दरवाज़ा है,
हर आँख में
एक अनकहा शहर।

सड़कें भागती रहती हैं,
मंज़िलें चुप रहती हैं—
और आदमी
अपने ही साए से आगे निकलने की
कोशिश करता रहता है।

काँच की इमारतों में
सूरज कैद है,
फुटपाथों पर
कुछ सपने
अब भी आसमान देखते हैं।

मैंने एक रात
इस शहर से पूछा—

“तू इतना बेचैन क्यों है?”

शहर मुस्कुराया—

“मैं नहीं,
तुम बेचैन हो।
मैं तो बस
तुम्हारे भीतर का शोर
दीवारों पर लिखता हूँ।”

मैंने फिर पूछा—

“फिर ये रोशनियाँ किसलिए?”

शहर बोला—

“जिस अँधेरे से तुम डरते हो,
वह गलियों में नहीं,
तुम्हारे भीतर रहता है।”

उस रात
पहली बार लगा—

ये शहर
सड़कों, मकानों और लोगों का नाम नहीं।

ये शहर
मेरी इच्छाओं की गलियाँ है,
मेरे डर के बंद दरवाज़े हैं,
मेरी स्मृतियों की धूल है,
और उन सपनों की छत है
जहाँ मैं आज भी
अपने पुराने आकाश को खोजता हूँ।

तब समझ आया—

शहर को बदलना हो
तो रास्ते नहीं,
राहगीर बदलना पड़ता है।

क्योंकि
हर शहर के भीतर
एक और शहर होता है—

और सबसे लंबी यात्रा
उसी शहर तक होती है
जो हमारे भीतर
अब भी अनजान है।
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1 hour ago

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