आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्षणभंगुर मनुष्य

                
                                                         
                            क्षणभंगुर यह मानव जीवन, संसार सदा चलता है,
                                                                 
                            
हम रुक जाते बीच राह में, समय निरंतर बहता है।

ना साँसों का ठौर सुनिश्चित, ना भाग्य सदा मुस्काता,
समय-चक्र की एक करवट, हर वैभव हर ले जाता।

धन, यौवन, पद और प्रतिष्ठा, सब यहीं पड़े रह जाएँ,
कल जिनके चर्चे होते थे, वे भी धूल में मिल जाएँ।

संसार नहीं रुकता किसी बिन, यह क्रम यूँ ही चलता है,
हम नहीं रहेंगे तो कोई और यहाँ फिर पलता है।

इसलिए व्यर्थ अहं क्यों हो, कैसी मन की दूरी,
प्रेम, दया, विनम्रता ही मानव की सच्ची पूँजी।

पर इतना भी मत झुक जाना, कि खुद को खो बैठो तुम,
समर्पण के अंधे पथ पर अपना मान न तोड़ो तुम।

जग की रीति यही कहती है, जो खुद को मिटा देता,
लोग उसी की कीमत अक्सर धीरे-धीरे खो देता।

इसलिए प्रेम रहे मन में, पर स्वाभिमान भी जीवित हो,
विनम्रता के पावन जल में अपना अस्तित्व सुरक्षित हो।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर