यह कविता केवल वर्षा और बाढ़ की कहानी नहीं,
बल्कि हमारी विकास-दृष्टि, पर्यावरणीय विवेक और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रश्न है।
“प्रश्न मगर हर वर्ष रहेगा,
उत्तर हमको देना होगा—
नदी, झील सब भर दिए तो,
पानी आखिर कहाँ बहेगा?”
— पानी बहे कहाँ?_
पवन चला लेकर संदेशा,
मेघ उमड़कर आए।
वर्षा-ऋतु की पहली बूँदें,
धरती के मन भाए॥
मेघ घिरे नभ के आँगन में,
बूँदों ने संदेश दिया।
सूखी धरती के अधरों को,
जीवन का परिवेश दिया॥
माटी की सौंधी खुशबू ने,
मन में फिर उल्लास भरा।
खेतों ने हरियाली ओढ़ी,
वन ने नव श्रृंगार धरा॥
ताल, पोखर, सरिता, निर्झर,
सबका मन आह्लादित था।
वर्षा केवल जल न थी वह,
जीवन का नवगीत था॥
पवन चला खेतों के ऊपर,
धान की बालें झूम उठीं।
बरखा की रिमझिम बूँदों से,
सूखी आँखें हँस उठीं॥
पर बदला जब समय अचानक,
बदला मानव का व्यवहार।
माटी के आँगन पर उतरा,
कंक्रीटों का विस्तार॥
नदी किनारे भवन खड़े हैं,
झीलों पर बाजार हुआ।
ताल-तलैया पाट दिए सब,
जल का घर लाचार हुआ॥
जिस धरती ने जल को सँभाला,
उस पर हमने जाल बुना।
जलधारा की राह रोककर,
अपना ही भविष्य चुना॥
गगनचुंबी भवन खड़े हैं,
ऊँचे उनके शिखर अपार।
नीचे जल में डूबी सड़कें,
कैसा अद्भुत है विस्तार॥
नाली छोटी, शहर बड़ा है,
जनसंख्या बेहिसाब।
एक बरस की तेज़ बरखा में,
ढह जाता सबका हिसाब॥
सड़कें बनतीं सरिता जैसी,
चौराहे बनते ताल।
महानगर की चकाचौंध में,
प्रकृति हुई बेहाल॥
पवन ठिठका शहर के ऊपर,
देख रहा यह दृश्य नया।
ऋतु ने पूछा—“कहाँ गया वह
जल का अपना घर भला?”
गाँवों में जब मेघ बरसते,
मेड़ें जल को थामतीं।
पोखर, खेत और कच्ची धरती,
बूँद-बूँद को बाँटतीं॥
जल धरती में उतर-उतरकर,
भूगर्भों को भरता था।
बरखा का हर एक कतरा,
भविष्य सुरक्षित करता था॥
अब वर्षा जब शहर में आती,
बन जाती है हाहाकार।
पंप, मशीनें, राहत-दल हैं,
फिर भी व्यवस्था लाचार॥
हम कहते हैं—“बाढ़ अचानक,
प्रकृति का यह दोष रहा।”
पवन बोला—“दोषी कौन है?
मार्ग किसका रोका था?”
नदियाँ कब घर आती हैं?
हम घर उनके पास गए।
जल के सारे मार्ग रोककर,
फिर जल से ही त्रस्त हुए॥
झीलों को हमने भूखंड बनाया,
पोखर को बाज़ार किया।
जल के प्राकृतिक घर को हमने,
मुनाफ़े का व्यापार किया॥
फिर जब बादल टूट बरसते,
पानी पूछे प्रश्न नया—
“जिस घर को तुमने छीन लिया था,
बताओ, मेरा घर है कहाँ?”
ऋतु बोली—“मैं हर सावन,
जीवन लेकर आती हूँ।
बूँद-बूँद में धरती का मैं,
सूना मन सहलाती हूँ॥
मुझको दोष न देना मानव,
मैं तो अपना धर्म निभाती।
तुमने ही जल-पथ रोक दिए,
मैं तो केवल जल बरसाती।”
बाढ़ नहीं केवल जलधारा,
यह चेतावनी का स्वर है।
हर डूबी सड़क बता रही—
कहाँ चूक मानव की है॥
राहत बाँटें, नाव चलाएँ,
यह भी मानव-धर्म मगर।
बाढ़ आने से पहले जागें,
यही सुशासन का उत्तर॥
नक्शों में नदियाँ मत बाँटो,
नालों को मत बंद करो।
जल के प्राकृतिक पथ को समझो,
धरती का सम्मान करो॥
विकास करो—पर विवेक सहित,
ऊँचे भवन बनाओ।
पर जल, जंगल और ज़मीन का,
प्राकृतिक अधिकार बचाओ॥
नदी बचेगी, झील बचेगी,
तभी बचेगा गाँव-शहर।
जल का सम्मान जहाँ होगा,
वहीं सुरक्षित होगा घर॥
आने वाली पीढ़ी पूछेगी—
“क्या था तुमसे अधिक ज़रूरी?”
क्या हम कह पाएँगे उसको—
“धरती क्यों रखी अधूरी?”
पवन चला फिर दूर दिशाओं,
ऋतु ने फिर संदेश सुनाया—
“जल है जीवन, जल है भविष्य,
जल को मत करना कभी पराया॥”
मेघ तो फिर हर साल बरसेंगे,
ऋतु अपना धर्म निभाए।
प्रकृति कभी प्रतिशोध न लेती,
बस अपना अधिकार जताए॥
नदी भरकर भवन बनाए,
झील मिटाकर शहर बसाया।
अब जब पानी घर में आया,
किसने उसका पथ बताया?
पवन कहे—“हे वर्षा-ऋतु, तुम
हर वर्ष चली ही आना।
धरती की प्यास बुझाने को,
जीवन-रस बरसाती जाना॥
पर मानव से इतना कहना—
जल की राह न रोकना।
नदी, झील, पोखर बचाना,
कल का जीवन सँजोना॥
मेघ बरसेंगे, पवन चलेगा,
ऋतु फिर गीत सुनाएगी।
धरती अपनी प्यास बुझाकर,
फिर हरियाली लाएगी॥
प्रश्न मगर हर वर्ष रहेगा,
उत्तर हमको देना होगा—
नदी, झील सब भर दिए तो,
पानी आखिर कहाँ बहेगा?
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