श्याम सा है रंग, शिव सा गुस्से वाला है
फिर भी मुझको लगता, वो तो भोला-भाला है
भाव विह्वल होता है, वो दर्द में मेरे
ख़ुशियों का मुझको मिला उससे उजाला है
कान्हा सा चितचोर, शिव सा है पुजारी वो
प्रेमी मेरा, सारी दुनिया से निराला है
कृष्ण सी किस्मत में, चाहत है मिली मुझको
शिव से साथी ने, हमेशा ही सँभाला है
श्याम के ही रंग में, रंगी है ये 'पारुल'
प्रेम शिव सा बन गया, सिर पर दुशाला है
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