मुसाफिर हैं सभी तो ज़िंदगी के इस सफ़र में
शमा बनकर जलो तुम भी किसी की रह-गुज़र में
सफर ये ज़िंदगी का पल में हो जाएगा पूरा
तक़ाज़ा है खुशी ही बाँटो उम्र-ए-मुख़्तसर में
हमारी दास्ताँ जब कल ज़ुबाँ पर हो किसी की
मसर्रत मुस्कुराए उनके दिल के भी नगर में
रुलाते सब है तुम हँसना सिखाओ तो किसी को
कला ग़म बाँटने की तुम करो शामिल हुनर में
चला जो धूप में मंज़िल भी उसको ही मिली है
नहीं बैठो कभी थक कर भी साया-ए-शजर में
है दिल में जोश, ताक़त जिस्म में जब तक भी 'पारुल'
किसी के काम आते रहना जीवन की डगर में
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