सहर से शाम तक लब हम न खोलेंगे
तेरी इस चुप्पी को लेकर ही सो लेंगे
बसी है यादें रग-रग में मेरे सारी
सभी से हम भी छुप छुप कर ही रो लेंगे
कटी टहनी की माफ़िक ही हैं मुरझाए
लहू के अश्कों से दामन भिगो लेंगे
ज़रा सी बात पर रूठे हो तुम हमसे
जहां को आँसू में हम भी डुबो लेंगे
मेरी ये मुंतज़िर आँखे तड़पती हैं
इन्हें यादों के अश्कों से ही धो लेंगे
सो ही जाएँगे इक दिन हम हमेशा को
बुलाओगे तो भी आँखें न खोलेंगे
यूँ गूँजेगी मेरी चुप्पी तेरे दिल में
रुआँसे मन में तेरे दर्द बोलेंगे
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