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किरदार में सच शुमार हो

                
                                                         
                            लाज़िम कहाँ के, ज़िंदगी भर इंतिज़ार हो
                                                                 
                            
हर बात पर मेरी, उन्हें भी ए'तिबार हो

अच्छाई तो भुलाई, मगर गलती याद है
फिर कैसे ज़िंदगी से, किसी को भी प्यार हो

सच की ही राह पर चले, फिर भी तो हारे हम
जीतेगा जिंदगी में वो, जो होशियार हो

हमको सिला बुराई  मिला, अचछे होने का
ऐसे में कौन है, जो नहीं शर्मसार हो

तस्बीह गिन के अच्छा नहीं बनना है मुझे
किरदार में ही सच तिरे 'पारुल' शुमार हो
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एक घंटा पहले

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