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ईद का चाँद

                
                                                         
                            मुंतज़िर रहती हैं ये दोआँखें बारह मास तुम्हारी
                                                                 
                            
रूह तो मेरी रहती ही है हमेशा ही पास तुम्हारी

हर वक़्त तुम सामने रहो ये नसीब नहीं हमारा
फिर भी आँखों को लगी रहती है आस तुम्हारी

मेरी आँखों में बसते हैं सिर्फ़ तुम्हारे ही ख़्वाब
ख़्वाबों में भी दिखती हैं दो आँखें ख़ास तुम्हारी

ईद का चाँद हो गए हो तुम तो शायद मेरे लिए
दूरियाँ नहीं होती अब इस दिल को रास तुम्हारी

अजब मरहलों से गुज़र रही है आजकल 'पारुल'
फ़िर भी एक अकेली वही है नज़र-शनास तुम्हारी
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एक वर्ष पहले

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