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इंसाँ क्या मुझसे ख़ुदा भी रूठा है शायद मेरा

                
                                                         
                            जिस्म की इस कैद से अब रूह चाहे है नजात
                                                                 
                            
आरजू बाकी नहीं जीने की भारी है हयात

अपना बन कर सब ने लूटा है शिकायत क्या करूँ
ज़िंदगी में है नहीं अब, कोई जीने जैसी बात

इंसाँ क्या मुझसे ख़ुदा भी रूठा है शायद मेरा
वरना यूँ होती नहीं हर बार दिल की मेरे मात

दौड़ती है आज भी रग-रग में चाहत कोई तो
इस कदर होती नहीं दिल में मेरे ये इल्तिफ़ात

काश वो जज़बात 'पारुल' के समझ पाता कभी
ज़िंदगी में आती मेरे फिर नहीं ग़म की ये रात
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9 घंटे पहले

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