आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बारिश यादों की

                
                                                         
                            तन मन भिगोती हैं मेरा, बारिश ये यादों की
                                                                 
                            
बातें भी सारी रह गईं, जैसे के ख़्वाबों की

जब याद करना, चाहते ही तुम नहीं तो, क्या
मैं याद अब दिलाऊँ, तुम्हें बातें वादों की

मैं हिज्र की रुदाद, बयाँ किससे अब करूँ
फ़ुर्सत किसे सुने, सदा ग़म के हिसाबों की

उल्फ़त में भीगे ख़त, लिखे थे तुमने जो कभी
आती है उनसे आज भी, ख़ुशबू गुलाबों की

क्यूँ तुम ख़फ़ा थे, काश हमें तुम बताते तो
'पारुल' ने देखी राह, हमेशा जवाबों की
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर