तन मन भिगोती हैं मेरा, बारिश ये यादों की
बातें भी सारी रह गईं, जैसे के ख़्वाबों की
जब याद करना, चाहते ही तुम नहीं तो, क्या
मैं याद अब दिलाऊँ, तुम्हें बातें वादों की
मैं हिज्र की रुदाद, बयाँ किससे अब करूँ
फ़ुर्सत किसे सुने, सदा ग़म के हिसाबों की
उल्फ़त में भीगे ख़त, लिखे थे तुमने जो कभी
आती है उनसे आज भी, ख़ुशबू गुलाबों की
क्यूँ तुम ख़फ़ा थे, काश हमें तुम बताते तो
'पारुल' ने देखी राह, हमेशा जवाबों की
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