आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अधूरा प्रेम

                
                                                         
                            क्या अधूरा प्रेम तुमको मुक्ति दे पाएगा
                                                                 
                            
रूह में मेरी तेरा कुछ हिस्सा रह जाएगा

वो मुलाकातों के वादे क्या भुला दोगे
ग़म उन्हीं वादों का मर के भी सताएगा

मिट्टी का तन मिट्टी में मिल जाना है इक दिन
मिट्टी बनकर भी न गंगा में समाएगा

तुम शिकायत रखना मत मुझसे दम-ए-रुख़सत
सिलसिला ये साथ तेरे उस जहां जाएगा

जन्मों से मिलते बिछड़ते आए हैं हम तुम
अब मिलन होगा ही अपना गर तू चाहेगा

साथ अवचेतन में यादें जाती है हर जन्म
सामना फिर जन्म अगले अपना हो जाएगा

जानते हो तुम भी सब कुछ पर न मानोगे
खफ़गी में ये प्यार अपना तू लुटाएगा

वक़्त रहते सारे शिकवे दूर कर लें हम
दर्द ये फ़ुर्क़त का दोनों को मिटाएगा

मान लेंगे के ख़ता सारी हमारी थी
माफ़ कर मुझको तू ऊँचा उठ ही जाएगा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर