क्या अधूरा प्रेम तुमको मुक्ति दे पाएगा
रूह में मेरी तेरा कुछ हिस्सा रह जाएगा
वो मुलाकातों के वादे क्या भुला दोगे
ग़म उन्हीं वादों का मर के भी सताएगा
मिट्टी का तन मिट्टी में मिल जाना है इक दिन
मिट्टी बनकर भी न गंगा में समाएगा
तुम शिकायत रखना मत मुझसे दम-ए-रुख़सत
सिलसिला ये साथ तेरे उस जहां जाएगा
जन्मों से मिलते बिछड़ते आए हैं हम तुम
अब मिलन होगा ही अपना गर तू चाहेगा
साथ अवचेतन में यादें जाती है हर जन्म
सामना फिर जन्म अगले अपना हो जाएगा
जानते हो तुम भी सब कुछ पर न मानोगे
खफ़गी में ये प्यार अपना तू लुटाएगा
वक़्त रहते सारे शिकवे दूर कर लें हम
दर्द ये फ़ुर्क़त का दोनों को मिटाएगा
मान लेंगे के ख़ता सारी हमारी थी
माफ़ कर मुझको तू ऊँचा उठ ही जाएगा
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