तुम हक़ीक़त अब नहीं आधा अधूरा ख़्वाब हो
आँखों में मेरी जो रहता है सदा वो आब हो
ज़िंदगी भर साथ क़िस्मत में नहीं शायद लिखा
वरना सच तेरी क़सम है दोस्त तुम नायाब हो
अपनी निस्बत जन्मों की है आज का नाता नहीं
खिंचती जिसकी ओर आई मैं वो तुम गिर्दाब हो
तुम नहीं चाहे मेरे, मै तो तेरी ही हूँ सनम
दिल से जिसको माना अपना तुम ही वो अहबाब हो
दूर होने से मोहब्बत ख़त्म तो होती नहीं
ज़िंदगी भर के लिए तुम ही वफ़ा का बाब हो
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