आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भारत की वीरांगनाएं

                
                                                         
                            बांध वंश को पीठ पर
                                                                 
                            
दांतो से कमान संभॉली थी
लेकर तलवार दोनो हाथो में
झांसी की रानी युध्द करने उतरी थी ।
नाको चने चबाने को
अंगे्जो की खाल उतारने को
वो मर्दानी मैदान मे दौड़ी थी
भारत को स्वतन्त्र करने को
लक्ष्मीबाई युध्द लड़ने उतरी थी ॥

रानी संग जौहर करने को
हजारो वीरांगनाएं भी साथ आयी थी
राख भी हाथ न लगा दरिंदो को
ऐैसी ज्वाला भड़काई थी।
चित्तौण का मान रखने को
खिलजी का गुरुर तोड़ने को
जिन्दा ही चिता पर जली थी
रानी पद्मावती अपने संग
भारत मॉ कि लाज बचाई थी ॥

तलवारो की भीषण टंकारो में भी
दुर्गावती की हुँकार सुनाई देता था
रणभूमि के चारो कोने मे
रानी का पराक्रम दिखाई देता था।
बाजबहादुर जैसे शाशको को
कइयों बार धुल चटाई थी
रानी ने अपने युद्ध कौशल से
मुगलो की नींव हीलाई थी॥

शादी की मेंहदी हाथों से मिटी भी न थी
शीश काटकर चुण्डावत को भेजवाया था
मोह खुद से भंग करने को
पति को विजय श्री दिलाने को
हाड़ी रानी ने अन्तिम निशानी भेजा था ।
माला पहन कर शीश की
चुण्डावत ने हाहाकार मचाया था
औरंगजेब के सैनिको के टुकडे़ टुकडे़ कर
मुगलो को उनकी हद्द समझाया था॥

कोटी कोटी नमन करता हुँ
भारत कि उन वीरांगनाओ को
जिन्होने ने जान न्यौछावर किया
देश कि मान बचाने को ॥

- पंकज कुमार श्रीवास्तव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर