किसने वन की मौन शिराओं
में यह विष-अग्नि भर दी?
किसने नभ की नीलिम आँखों
पर धूमिल चादर धर दी?
काँप उठी निर्झर की वीणा,
म्लान हुआ उपवन का हास,
मानव के उन्मत्त करों ने
छीन लिया धरती का श्वास।
विटपों की छाया में पलता
था जीवन का मधुर प्रणय,
पल्लव-पल्लव में गूँजता था
प्राची का स्वर्णिम विनय।
आज वही तरु मौन खड़े हैं,
छिन्न हुआ उनका विस्तार,
ज्यों वंशी के टूटे स्वर में
रोता हो भू का सत्कार।
नदियों की चंचल पलकों पर
किसने तम का लेप किया?
निर्मल जल के दर्पण में
स्वार्थों का संदेह जिया।
कल तक जो कल-कल बहती थीं
प्राणों की संगीत-धार,
आज वही निस्तब्ध खड़ी हैं
लेकर उर में विष का भार।
अंबर के उर में अब वैसी
निर्मल शीतलता कहाँ?
धूप हुई अंगार-वेदना,
हरित स्वप्न की छाया कहाँ?
प्रगति-विलासों की मरीचिका
मन को कितना भरमाए—
जब जड़ वैभव के उत्सव में
जीवन का स्पंदन मिट जाए।
प्रकृति नहीं उपभोग-वस्तु,
वह चेतन का गहन स्वर है;
उसके कण-कण में ही निहित
मानवता का अंतर-घर है।
उस पर अंकित प्रत्येक क्षति
आत्मा तक पहुँच जाती,
धरती की करुणा रो उठती,
जब संवेदना सो जाती।
आओ फिर से वृक्षों के संग
मौन प्रार्थनाएँ बोएँ,
नदियों के थके अधरों पर
निर्मल आशाएँ संजोएँ।
मानव तब ही पूर्ण बनेगा
जब प्रकृति से तादात्म्य हो,
जब उसके उर की धड़कन में
धरती का भी स्पंदन हो॥
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