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"मौन का उत्तरदायित्व"

                
                                                         
                            कभी-कभी लगता है—
                                                                 
                            

घर
एक ही दिन में नहीं टूटते,

उनकी दीवारों में
पहले मौन उगता है।

धीरे-धीरे।

मैंने देखा है—

कोलाहल के बीच भी
सत्य जीवित रह सकता है,

पर वह क्षीण पड़ जाता है

जब उसे पहचानने वाली आँखें
नीचे झुक जाती हैं।

सभा में

बहुत-से स्वर थे,

निर्णायक, आत्मविश्वासी, तीखे—

और एक कोने में बैठा विवेक

मानो अपनी ही प्रतीक्षा कर रहा था।

मैं सोचता रहा—

क्या अनुभव
वर्षों की यात्रा के बाद

अंततः मौन में बदल जाता है?

या हम ही

सुविधा का नाम देकर
अपने दायित्व से हट जाते हैं?

अजीब है—

अल्प ज्ञान
अक्सर उद्घोष बन जाता है,

और गहन समझ

अपने ही भीतर
सिमटती चली जाती है।

पर समय

किसी की ऊँची आवाज़ नहीं,

अनुपस्थित शब्द भी सुनता है।

इसलिए अब

मैं अपने मौन को टटोलता हूँ।

कहीं ऐसा तो नहीं

कि संबंध बचाने की आकांक्षा में

मैंने सत्य को
अकेला छोड़ दिया हो?

क्योंकि हर चुप्पी
शांति नहीं होती।

कुछ चुप्पियाँ

धीरे-धीरे
असत्य की छाया बन जाती हैं।

और तब

दोष केवल उनका नहीं रहता
जो बोलते रहे,

उसका भी होता है

जो जानता था—

फिर भी नहीं बोला।
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एक दिन पहले

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