किस वन-देवता की वीणा के
टूट गए सब तार आज?
निशि के भीगे उर में काँपे
निर्जन पथ, निष्प्राण समाज।
कटे तरु ऐसे गिरे धरा पर,
ज्यों स्वप्न किसी का टूट गया,
पक्षी का नन्हा गान अकस्मात्
अंबर में ही छूट गया।
कहाँ गई वह गंध मृदा की,
वह वर्षा की प्रथम फुहार?
अब तो धूल भरे पथ पर ही
चलता दग्ध दिवस का भार।
नदियों की पलकों पर ठहरा
सूखे जल का मौन विषाद,
मानव के उन्मत्त करों ने
छीन लिया प्रकृति का नाद।
गगनचुंबी प्रस्तर-वन में
कैद हुई नभ की स्वच्छ श्वास,
धूम-रुद्ध इस काल-कक्ष में
कौन सुने धरती की प्यास?
दीपित नगरों की चकाचौंध
तम का ही विस्तार बनी,
प्रगति-विलासिनी यह माया
जीवन की संहारिणी बनी।
मशीनों के निष्ठुर स्वर में
डूब गई कोयल की तान,
लोहे के निर्जीव हृदय ने
हर ली वन की मधुमय जान।
अट्टालिकाओं के भीतर
कैसा यह एकांत घना—
मानव अपने ही निर्मित
श्मशान-नगर में हुआ सना।
विवेक-दीप जब बुझ जाता,
माया का तम बढ़ता है;
मनुज स्वयं अपने कर से ही
जीवन-मूल उखड़ता है।
भूल गया—
तरु की छाया में ही
श्वासों का संगीत पला,
वन के उर से ही मानव का
प्राण-दीप चिरकाल जला।
तप्त धरा की सूनी देह पर
अंबर अग्नि-वर्षा करता,
बूँद-बूँद को व्याकुल जीवन
मूक व्यथा में दिनभर मरता।
पशु-पक्षी के शुष्क कंठ में
करुण पुकारें काँप रहीं,
मानव की अंधी आकांक्षा
प्रकृति-शिला पर छाप रही।
अब भी यदि चेतो तो संभव
फिर हरितिम स्वर लौटेगा,
सूखे वन के रिक्त हृदय में
नव पल्लव का स्पर्श जगेगा।
रोपो फिर विश्वास धरा में,
तरुओं से संवाद करो,
इस घायल वसुधा के उर पर
करुणा का नव प्रसाद धरो।
प्रार्थना यही—
मानव फिर से
अपने अंतर को पहचान सके,
भोग-विलासों के मरु में भी
जीवन-निर्झर जान सके।
हरित हो पुनः धरा की देह,
नभ का संताप विलीन हो;
सृष्टि पुनः उस मौन लय में
प्राणवती, कल्याणमयी हो॥
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