सृजन कोई संचित धन नहीं,
जो व्यय होकर शून्य हो जाए।
यह तो अंतर की वह सरिता है,
जो बहकर ही अपना पथ पाए।
मन के निस्तब्ध आँगन में,
जब कोई स्वप्न आकार लेता है,
अदृश्य संभावनाओं का बीज
धीरे-धीरे विस्तार लेता है।
कल्पना के सूने वन में
एक विचार जब अंकुरित होता है,
तब चेतना का मौन आकाश
नव आलोक से दीप्त होता है।
जो भीतर की अग्नि को
अभिव्यक्ति का अवसर देता है,
वह केवल शब्द नहीं रचता,
स्वयं को भी पुनः गढ़ लेता है।
दीप से दीप प्रज्वलित हों,
तो मूल ज्योति क्षीण नहीं होती;
प्रकाश की यही प्रकृति है—
वितरण में ही पूर्णता होती।
रचनात्मकता का प्रत्येक स्पर्श
अज्ञात क्षितिजों तक जाता है,
एक हृदय में जन्मा भाव
अनेक आत्माओं में गूँज उठता है।
जो बाँधते हैं अपने स्वप्नों को,
वे सीमाओं में खो जाते हैं;
जो उन्हें मुक्त गगन देते हैं,
वे अनंत दिशाओं को पाते हैं।
इसलिए सृजन करते रहो,
नव चेतना के द्वार खोलो;
अक्षय स्रोत तुम्हारे भीतर है,
उसके प्रकाश में स्वयं को तोलो।
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