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जब स्वीकारते ही बोझ विलीन हो गया।

                
                                                         
                            भीड़ का कोलाहल
                                                                 
                            
जब थककर लौट गया,
तब ढकी हुई परतों के नीचे
एक अपरिचित दस्तक हुई;
वह कोई बाहर का अतिथि नहीं था।

वह मेरा ही वह अंश था
जिसे मैं संसार की वीथियों में
अक्सर छोड़ आता था,
दूसरों की गढ़ी कहानियों को
सच्चा मानकर जीने के लिए।

मैंने देखा—
उसकी आँखों में
सदियों की संचित थकान थी,
और होंठों पर
स्वीकृति की भीख न माँगने का गौरव।

वह बोला—
"तुमने हर बार मुझे टाला है,
ताकि लोगों की सम्मतियाँ
तुम्हें सुरक्षित रख सकें;
पर अभिनय कब तक सत्य का विकल्प होगा?"

उस एक प्रश्न ने
भीतर जमी हुई बर्फ को
अचानक पिघला दिया;
अपराध बोध की धुंध छँटी,
और भ्रम की दीवारें ढह गईं।

स्वीकार कर लिया मैंने—
अपनी अधूरी आकांक्षाओं को,
अपने छिपे हुए भयों को;
और अद्भुत था वह क्षण,
जब स्वीकारते ही बोझ विलीन हो गया।

अब कोई मुखौटा नहीं है,
न ही संपूर्ण होने का कोई दंभ;
अज्ञेय के इस महासागर में
मैं जैसा हूँ,
निखालिस और अखंड हूँ।

जिसे खोजने
दौड़ता रहा जन-प्रवाह में,
वह तो इसी मौन के केंद्र में था;
आज स्वयं से मिलकर
मैं स्वयं में लौट आया हूँ।
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एक घंटा पहले

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